Published on August 29, 2026 4:00 pm by MaiBihar Media
बिहार की सियासत में सरकारी खजाने और खर्च के तौर-तरीके पर भी बहस का बड़ा मुद्दा बनते जा रहे हैं। दरअसल बिहार में किस्तों में भुगतान होने के आधार सामने आया है. विपक्ष इसे सरकार की वित्तीय परेशानी से जोड़ रहा है, जबकि सरकार की तरफ से अलग-अलग योजनाओं और भुगतान को लेकर सफाई दी जा रही है। हालाँकि बिहार को आर्थिक संकट में बताना जल्दबाजी होगी।
स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना ने बढ़ाया सियासी तापमान
सबसे पहले स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना ने सियासी तापमान बढ़ाया। अगस्त में योजना के तहत कर्ज देने के तौर-तरीके में बदलाव की खबर सामने आई। नए ढांचे में बिहार स्टेट एजुकेशन फाइनेंस कॉरपोरेशन से ₹2 लाख तक और ₹2 लाख से ₹4 लाख तक की राशि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के जरिए उपलब्ध कराने की बात सामने आई।मामले ने तूल पकड़ा तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 24 अगस्त को साफ किया कि उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को पहले की तरह ₹4 लाख तक का स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड मिलता रहेगा। यानी सरकार ने अधिकतम कर्ज सीमा घटने की आशंका को खारिज कर दिया।लेकिन सियासी सवाल
संविदा पर काम कर रहे डेटा एंट्री ऑपरेटर भी नाराज
डेटा एंट्री ऑपरेटरों का इंक्रीमेंट अटका संविदा पर काम कर रहे डेटा एंट्री ऑपरेटर भी अपने इंक्रीमेंट को लेकर इंतजार कर रहे हैं। बिहार राज्य डेटा एंट्री ऑपरेटर संघ ने वित्त विभाग के मंत्री को पत्र देकर सालाना 10 प्रतिशत इंक्रीमेंट लागू करने की मांग की है। संघ का दावा है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर पंचायत स्तर तक 20 हजार से ज्यादा डेटा एंट्री ऑपरेटर काम कर रहे हैं। इंक्रीमेंट का मामला लंबे समय से लंबित रहने पर कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ने की आशंका है। बड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार पर भी सवाल वेतन और कल्याणकारी योजनाओं के अलावा विकास योजनाओं में फंड जारी होने की गति को लेकर भी चर्चा है। पथ निर्माण विभाग के बड़े प्रोजेक्ट्स में राशि चरणबद्ध तरीके से जारी होने की बात सामने आई है।
वेतन-पेंशन भी चरणों में जारी सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान को लेकर सामने आई जानकारी ने सबसे ज्यादा सवाल खड़े किए हैं। वित्त विभाग की ओर से 2026-27 के बजट से वेतन मद की राशि अलग-अलग चरणों में जारी किए जाने की बात सामने आई है। विश्वविद्यालयों के शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों के लंबित वेतन-पेंशन भुगतान को लेकर भी चरणबद्ध राशि जारी होने की जानकारी है।
विधायक मद की योजनाओं में भी स्वीकृति और भुगतान को लेकर देरी के सवाल उठे हैं। इसका असर सीधे तौर पर विकास कार्यों की रफ्तार पर पड़ सकता है। अगर किसी योजना के लिए राशि समय पर उपलब्ध नहीं होती तो काम शुरू होने या आगे बढ़ने में देरी हो सकती है। यही वजह है कि सरकारी खर्च की गति अब राजनीतिक मुद्दा बन रही है।
पीआरएस के अनुसार 2026-27 में राज्य का कुल खर्च कर्ज चुकाने को छोड़कर करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है और राजस्व अधिशेष का भी अनुमान रखा गया है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि बिहार सरकार आर्थिक संकट में है। लेकिन एक साथ कई विभागों और योजनाओं में भुगतान की रफ्तार पर सवाल उठना जरूर गंभीर विषय है। सरकार के सामने अब यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि किस्तों में भुगतान के पीछे प्रशासनिक प्रक्रिया है, बजट प्रबंधन है या नकदी उपलब्धता से जुड़ी कोई समस्या।
