Published on August 24, 2021 4:11 pm by MaiBihar Media
बॉलीवुड की महानतम हस्ती दिलीप कुमार साहब जिनको ट्रेजेडी किंग के नाम से जाना जाता था। उन्होंने आज मुंबई में आखरी सांस ली। उनके निधन की खबर से फिल्म जगत से लेकर राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ पड़ी। उन्होंने बुधवार को करीब 7:30 बजे अंतिम सांसे लीँ। दिलीप कुमार को जुहू कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। दिलीप कुमार को कई सेलेब्स ने उनके घर पहुंचकर अंतिम विदाई दी। वहीं, महाराष्ट्र के सीएम भी खुद उनके घर पहुंचे हुए थे।
बहरहाल, दिलीप कुमार बॉलवुड के प्रसिदध हस्तियों में से एक थे। आइए, जानते है उनकी कुछ चर्चित डॉयलॉग्स और उनके उपर लिखी गई किताब(आत्मकथा) के बारे में-
- जब अमीर का दिख खराब होता हैं ना, तो गरीब का दिमाग खराब होता है
- प्यार देवताओँ का वरदान हैं जो केवल भाग्यशालियों को मिलता हैं।
- जो लोग सच्चाई की तरफदारी की कसम कहते हैं। जिंदगी उनके बड़े कठिन इम्तिहान लेती है।
- पैदा हुए बच्चे पर जायज नाजायज की छाप नहीं होती, औलाद सिर्फ औलाद होती है।
- हालात, किस्मतें, इंसान, जिंदगी। वक्त के साथ-साथ सब बदल जाता है।
- जिसके दिल में दगा आ जाती है। ना, उसके दिल में दया कभी नहीं आती।
- ये खून के रिश्ते हैं, इंसान ना इन्हें बनाता है, ना ही इन्हें तोड़ सकता है।
- मोहब्बत जो डरती है वो मोहब्बत नही…अय्याशी है गुनाह है
- हक हमेशा सर झुकाके नहीं, सर उठाके मांगा जाता है।
- कुल्हाड़ी में लकड़ी का दस्ता ना होता, तो लकड़ी के काटने का रास्ता ना होता
- बड़ा आदमी अगर बनना हो तो छोटी हरकतें मत करना
खास बात यह है कि बॉलीवुड की महानतम हस्ती दिलीप कुमार जीवन संघर्ष, सफलता, सम्मान और समझ की वह कहान है, जिसे हमारी भारतीय सभ्यता, परिवार और समाज एक आदर्श मानता है। सपनों से भरे एक युवा के जीवन की इस यात्रा को अंकित करने का कार्य उनके ही जीनकाल में ही चर्चित पत्रकार और लेखक उदय तारा नैयर को जाता है। अंग्रेजी में दिलीप साहब के शब्दों को उन्होंने लिखा और उनके जीनकाल में ही यह ‘DILIP KUMAR-THE SUBSTANCE AND THE SHADOW ; An Autobiography नाम से प्रकाशित हुई। हिंदी में वाणी प्रकाशन ने इसे ‘दिलीप कुमार – वजूद और परछाई ‘ नाम से प्रकाशित किया।
इस किताब के कुछ अंश से ही पता चल जाता है कि दिलीप कुमार ने अपनी जिंदगी को कैसे जिया। उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए एक आम बेचने वाले से फिल्मी दुनिया का सफर कैसे तय किया। उनकी आत्मकथा- पुस्तक अंश- दिलीप कुमार : वजूद और परछाई, शाहखर्च की वापसी में लिखा है कि “ वे इस बात से खुश थे कि उनके एक लड़के में यह हुनर था तकि वह उनके फलों के कारोबार को आगे बढ़ा सके। मेरे अन्दर यह भाव भी उठ रहा था कि यह बहुत अच्छा होगा कि मोहम्मद सरवर खान जो एक कामयाब फल व्यापारी है उसे हुनर सीखकर परिवार के काम को आगे बढ़ाया जाए, लेकिन मैं इसके लिए नहीं बना था। ” इतना ही नहीं इस कितब में एक राज भी है, जो यह बताता है कि आखिर दिलिप कुमार की मां ने क्यों खिलाई थी ‘कुरान’ की कसम
बता दें कि दिलीप कुमार अपने जमाने में दादासाहब फाल्के पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके थे। उन्होंने फिल्मी अभिनय के साथ राजनीतिक गलियारों में भी कदम रखा और राज्यसभा के सदस्य के रुप में समाज सेवा की। दिलीप कुमार पिछले काफी समय से बीमार चल रहे थे, परिवार वालो का कहना था कि उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई थी। जिस कारण उन्हें इमरजेंसी में अस्पताल ले जाया गया।
